स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अध्यापक शिक्षा के क्षेत्र में काफी परिवर्तन देखने को मिलता है. जब देश आजाद हुआ तब प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक की स्थिती अच्छी नही थी. देश की शिक्षा व्यवस्था ठीक करने तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए तमाम समितियों तथा आयोगों का गठन किया गया. इन आयोगों ने तमाम सिफारिशें प्रस्तुत किया और उनके ही आधार पर आज पूरे देश में अध्यापक शिक्षा का अंतरजाल इस तरह से फ़ैल गया है जैसे एक विशालकाय वृक्ष. इन आयोगों ने अध्यापक शिक्षा का विकास किया है.
विश्वविद्यालय आयोग(1948-49)
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह पहला आयोग है जिसने उच्च शिक्षा पर बल दिया. अध्यापक शिक्षा की संरचना की आलोचनात्मक समीक्षा करते हए इसके पुनर्गठन की बात की. कोर्स में लचीलापन लाने की बात की. इसके साथ ही शिक्षण प्रशिक्षण पर जोर देते हए सही और उचित विद्यालय में भेजे जाने की बात की.अध्यापक शिक्षा के सम्बन्ध में डिग्री कॉलेजों की पहली सभा 1950 में बरोड़ा में हुई.
माध्यमिक शिक्षा आयोग(1952-53)
इस आयोग के अनुसार अध्यापक शिक्षा का कार्यक्रम एक वर्षीय हो तथा दो विषयों का प्रशिक्षण दिया जाये. आयोग के अनुसार शिक्षण कौशल के साथ-साथ अन्य कौशलों के विकास पर जोर देते हुए उनको व्यावाहारिक ज्ञान देने पर विशेष ध्यान दिया जाये. इसके साथ-साथ पाठ्य सहगामी क्रियाएँ, पुस्ताकालय कार्य को भी शामिल किया जाये.
फोर्ड फाउंडेशन टर्म (1954)
भारत सरकार ने इस फाउंडेशन के साथ मिलकर आठ सदस्ययी अंतर्राष्ट्रीय टीम का गठन किया जिन्होंने प्रयोगशाला विद्यालय के ऊपर एक demonstration दिया. अध्यापक शिक्षा संस्थान में प्रयोगशाला विद्यालय खोले जाने सम्बन्धी सुझाव दिया तथा पाठ्यचर्या निर्माण की बात की.
Pires Committee (1956)
इस समिति का कहना था की सैधांतिक विषय के अलावा प्रायोगिक कार्य पर जोर दिया. इसके अलावा प्रश्न पत्रों को कम करने की बात की और उसे चार भागों में बाँट दिया
१). शिक्षा के सिद्धांत और विद्यालय प्रबंधन
२). शैक्षिक मनोविज्ञान और स्वास्थ्य शिक्षा
३). दो विषयों में शिक्षण प्रक्रिया
४). भारतीय शिक्षा की समकालीन समस्या
कोठारी आयोग या शिक्षा आयोग (1964-66)
इस आयोग ने अध्यापक शिक्षा के सम्बन्ध में बात की और उसकी गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सहायता प्रदान किये जाने की बात की ताकि अध्यापक शिक्षा में सुधार हो सके. अध्यापकों के प्रशिक्षण पर बल दिया.
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1968)
इस समिति ने अध्यापक को राष्ट्रीय धरोहर बताया और उनके सुविधाएँ पर ध्यान देने की बात की तथा उनके वेतन वृद्धि की बाद की और सेवाओं में सुधार तथा जिम्मेदारी को कम करने की बात की.
फर्स्ट एसियन कॉन्फ्रेंस ऑन टीचर एजुकेशन (1971)
यह कॉन्फ्रेंस एसोसिएशन ऑफ टीचर एजुकेशन और द इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ़ एजुकेशन फॉर टीचिंग के तत्वाधान में 14 से 19 जून 1971 को बैंगलोर में संपन्न हुआ जिसमें स्कूली शिक्षा और अध्यापक शिक्षा के चुनौतीयों को कैसे सुलझाया जाये इस पर बात की गयी.
ITEP Plan of नेशनल कौंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग
इसने NCERT के साथ मिलकर काम किया. यह प्रीमियम संस्था है जो अध्यापक शिक्षा में गुणवत्ता के विकास हेतु कार्य करता है. इसके साथ साथ दिशा-निर्देश भी जारी करता है. शिक्षकों को प्रशिक्षित करता है.
नेशनल कमीशन ऑन टीचर्स (1983-85)
यह आयोग शिक्षकों के प्रशिक्षण पर अधिक बल देने की बात की है. यह आयोग कहता है की स्कूली शिक्षक बनने के लिए सेकेंडरी स्तर के बाद चार साल का और स्नातक के बाद पांच वर्ष का अध्यापक प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होगा .
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986)
अध्यापक शिक्षा एक सतत प्रक्रिया है जो की सेवारत और सेवापूर्व शिक्षण का अभिन्न अंग है. इस नीति के तहत अध्यापक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करने की बात की गयी. इस नीति के तहत प्रत्येक जिला में DIET कॉलेज खोलने की बात की गयी साथ ही 250 कॉलेज को कॉलेज ऑफ टीचर एजुकेशन में हस्तांतरण की बात की गयी और 50 INSTITUE OF ADVANCED STUDIES IN EDUCATION तथा SCERT खोलने की बात की गयी.
आचार्य राममूर्ति समिति (1990)
इस समिति ने दो बातों पर ध्यान दिया है १) इंटर्नशिप २) रिफ्रेशर कोर्स
प्रैक्टिस टीचिंग के लिए जब विद्यार्थियों को भेजा जाता है तब उससे अपेक्षा की जाती है की वह वास्तविक समस्याओं को सुलझाना सीखे. साथ ही रिफ्रेशर कोर्स की बाद की गयी जिसमें अध्यापकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर चलाया जाये.
यशपाल समिति (1993)
यह समिति कहता है अध्यापक शिक्षा में अगर गुणवत्ता नहीं है तो स्कूली शिक्षा में भी गुनवत्ता नही होगी. एक बेहतर और विशिष्ट शिक्षक तैयार करने हेतु कॉलेजों में बी.एड. ट्रेनिंग होना चाहिए. स्नातक छात्रों के लिए एक वर्ष का बी.एड. कोर्स, हायर सेकंडरी छात्रों के लिए चार वर्ष की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए. पाठ्य वस्तु में सुधार लाया जाना चाहिए. शिक्षकों में अपने कर्त्तव्य के प्रति निष्ठां भाव होना चाहिए. उनमे स्वतंत्र सोच विचार होना चाहिए.
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005
NCF 2005 के अनुसार शिक्षक की गुणवत्ता उनके ज्ञान के पर निर्भर करता है. NCF 2005 में भाषा पर बल देते हए कहता है की अध्यापकों को भाषा का ज्ञान होना आवश्यक है. अध्यापक शिक्षा में योग शिक्षा और शारीरिक शिक्षा को शामिल करने की बात की गयी है. इसके साथ-साथ भावी अध्यापकों के लिए प्रशिक्षण का समय बढाया जाना चाहिए. अध्यापक शिक्षा में निर्माणवादी उपागम को अपनाया जाना चाहिए.
राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद्
इसकी स्थापना इसलिए किया गया था की शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता को बढाया जा सके. शिक्षक को शिक्षण कार्य के साथ-साथ शोध, कार्यशाला तथा प्रोजेक्ट कार्य भी करना चाहिए.राज्य स्तर, केंद्रीय स्तर के टीचर ट्रेनिंग कॉलेज की स्तर एवं गुणवत्ता को सुधारने हेतु दिशा निर्देश तैयार करती हैं.
उत्तम लेख
ReplyDeleteअध्यापक शिक्षा के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण लेख
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