बौद्ध काल का आरम्भ 501 ई. पूर्व से 1200 ई. पूर्व तक माना जाता है. औपचारिक रूप से अध्यापक शिक्षा की शुरुआत बौद्ध काल को कहा जा सकता है जबकि अनौपचारिक रूप से इसकी शुरुआत वैदिक काल या प्राचीन काल कही जा सकती है. इस काल में शिक्षा-दिक्षा हेतु पालि भाषा का का प्रचलन था. बौद्ध धर्म से सम्बंधित पालि साहित्य वैदिक साहित्य के बाद सबसे प्राचीन रचनाओं की कोटि में आता हैं.
बौद्ध कालीन अध्यापक शिक्षा को औपचारिक शिक्षा प्रणाली इसलिए माना जाता है क्योंकि इस काल में गुरु-शिष्य परम्परा का चलन था जो की वैदिक काल की सर्वाधिक प्रचलित परम्परा थी. गुरु अपने शिष्यों के सर्वागीण विकास के लिए गुरुकुल परम्परा में शिक्षा प्रदान करते थे. वैदिक काल से चली आ रही गुरुकुल परम्परा का बौद्ध काल में थोड़ा परिवर्तन होता है और शिक्षा गुरुकल से निकल कर संघ और मठों में दिया जाने लगता है. संघ और मठों के कड़े नियम बने हुए थे जिनका पालन शिष्यों को अनिवार्य रूप से करना पड़ता था. शुद्धता एवं सरल जीवन संघ और मठों का मुख्य उद्देश्य हुआ करता था. संघ या मठों में गुरु के द्वारा अनुशासन पर जोर दिया गया और उसके माध्यम से व्यक्तित्व के निर्माण पर बल दिया जाने लगा. बौद्ध काल में शिक्षार्थीयों को संघ या मठ में ही रह कर शिक्षा लेनी पड़ती थी. अध्यापक या गुरु शिक्षार्थी को व्यक्तिगत रूप में भी शिक्षा देते थे. संघ में अध्यापक के साथ रह कर ही शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करते थे. इस काल में भी मौखिक शिक्षा पद्धति थी. इस काल में शिष्य भिक्षु के रूप में शिक्षा की दीक्षा ले रहे थे. यही शिष्य आगे चलकर भिक्षुक का जीवन जीते थे था बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करते थे.
बौद्धकालीन शिक्षा प्रणाली को औपचारिक शिक्षा का आधारशिला माना जाता है. शिक्षा हेतु संघ और मठों की स्थापना हो चुकी थी. जिनको भी शिक्षा लेने होती थी वे संघ और मठों में प्रवेश लेते थे और वहां के कड़े नियमों का पालन करते हुए शिक्षा ग्रहण करते थे. इस कल में भी धार्मिक शिक्षा का प्रचलन था. संघ और मठों में अनुशासन को विशेष महत्व दिया जाता था और साथ ही नैतिकता की शिक्षा भी दी जाती थी. शिक्षार्थियों का प्रव्ज्जा और उप्सम्प्दा संस्कार संघ और मठों में प्रचलित था.
उपरोक्त बातों के आधार पर हम कह सकते हैं की बौद्धकाल में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत होती है और शिक्षा गुरुकुल से निकल कर संघ और मठों में दी जाने लगती हैं.

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