सामान्य रूप में देखा जाए श्रवण, मनन और चिंतन में अधिक अंतर नहीं हैं. वैदिक काल में शिक्षण की पद्धति श्रवण, मनन और चिंतन हुआ करती थी. आज के समय में भी शिक्षण की यही पद्धति अपनाई जा रही हैं. अगर देखा जाये तो इस शिक्षण पद्धति में कुछ अधिक बदलाव नहीं हुआ हैं. आज भी शिक्षण की ये पद्धति उसी रूप में अपनाई जा रही हैं. वैदिक काल में शिक्षण के लिए लिखित सामग्री के रूप में कुछ भी उपलब्ध नहीं था जिस कारण यह पद्धति अपनाई जा रही थी.
अब हम श्रवण, मनन और चिंतन में अंतर देखेंगे .
श्रवण : यह परम्परा की अनुपम कृति है जो की हजारों सालों से चली आ रही हैं. श्रवण का अर्थ सामान्य रूप में सुनना है किन्तु शिक्षण पद्धति में इसका अर्थ केवल सुनना न होकर ध्यानपूर्वक या एकाग्रचित होकर सुनना अथवा ग्रहण करना हैं. जब भी शिक्षण के दौरान हम किसी भी सार्थक बातों को ध्यानमग्न होकर सुनते है वही श्रवण हैं. श्रवण के दौरान हम अपने गुरु या आचार्यों की बातों को बड़े ही ध्यान से सुनते हैं ताकि उनके द्वारा कही या बताई गयी बातें हमारे मन-मस्तिष्क में अच्छे से समाहित हो. अगर बालक या शिक्षार्थी अपने गुरु या आचार्यों की बातों को ध्यान से नहीं सुनेगा तब वह उनके द्वारा कही गयी बातों को याद नही रख पाएगा. इसलिए हम कह सकते है की श्रवण का अर्थ सामान्य सुनना न होकर ध्यानपूर्वक सुनना है.
मनन : सामान्य रूप में इसका अर्थ श्रवण गई बातों को दुहराना हैं अर्थात अपने गुरु या आचार्य द्वारा बताई गई बातों को मन में बार - बार सोचना. अपने मन या मस्तिष्क को एक दिशा देने के लिए जो विचार किया जाता है वही मनन हैं. मनन हमें सत्य - असत्य, उचित - अनुचित आदि में विश्लेषण करने की क्षमता प्रदान करता हैं. मनन किसी भी चीज़ के प्रति
विवेकपूर्ण निर्णय लेने के लिए मन को एकाग्र करता है जिससे हम उचित विचार कर पाते है या निर्णय ले पाते हैं.
चिंतन : चिंतन एक मानसिक प्रक्रिया हैं जिसमें हम किसी विचार या किसी बात को गहराई से सोचते हैं तथा किसी निर्णय पर पहुचते हैं. चिंतन का अर्थ होता है कई प्रकार से सोचना. चिंतन अर्थात् किसी विषय पर सकारात्मक सोच के साथ मनन करना . चिंतन का आरम्भ किसी समस्या या कठिनाई से होती है जिसका अंत समाधान के साथ होता हैं.
इस तरह से हम पाते हैं श्रवण, मनन और चिंतन तीनों एक दूसरे से जुड़े हैं. इन्हें अलग नही किया जा सकता . इनका आपस में सम्बन्ध हैं. तीनों एक तरह से क्रम में ही चलते हैं. जब तक किसी चीज़ का श्रवण नहीं किया जाएगा तब तक न ही उस चीज़ का मनन किया जा सकता हैं और नहीं उस पर चिंतन.
अब हम श्रवण, मनन और चिंतन में अंतर देखेंगे .
श्रवण : यह परम्परा की अनुपम कृति है जो की हजारों सालों से चली आ रही हैं. श्रवण का अर्थ सामान्य रूप में सुनना है किन्तु शिक्षण पद्धति में इसका अर्थ केवल सुनना न होकर ध्यानपूर्वक या एकाग्रचित होकर सुनना अथवा ग्रहण करना हैं. जब भी शिक्षण के दौरान हम किसी भी सार्थक बातों को ध्यानमग्न होकर सुनते है वही श्रवण हैं. श्रवण के दौरान हम अपने गुरु या आचार्यों की बातों को बड़े ही ध्यान से सुनते हैं ताकि उनके द्वारा कही या बताई गयी बातें हमारे मन-मस्तिष्क में अच्छे से समाहित हो. अगर बालक या शिक्षार्थी अपने गुरु या आचार्यों की बातों को ध्यान से नहीं सुनेगा तब वह उनके द्वारा कही गयी बातों को याद नही रख पाएगा. इसलिए हम कह सकते है की श्रवण का अर्थ सामान्य सुनना न होकर ध्यानपूर्वक सुनना है.
मनन : सामान्य रूप में इसका अर्थ श्रवण गई बातों को दुहराना हैं अर्थात अपने गुरु या आचार्य द्वारा बताई गई बातों को मन में बार - बार सोचना. अपने मन या मस्तिष्क को एक दिशा देने के लिए जो विचार किया जाता है वही मनन हैं. मनन हमें सत्य - असत्य, उचित - अनुचित आदि में विश्लेषण करने की क्षमता प्रदान करता हैं. मनन किसी भी चीज़ के प्रति
विवेकपूर्ण निर्णय लेने के लिए मन को एकाग्र करता है जिससे हम उचित विचार कर पाते है या निर्णय ले पाते हैं.
चिंतन : चिंतन एक मानसिक प्रक्रिया हैं जिसमें हम किसी विचार या किसी बात को गहराई से सोचते हैं तथा किसी निर्णय पर पहुचते हैं. चिंतन का अर्थ होता है कई प्रकार से सोचना. चिंतन अर्थात् किसी विषय पर सकारात्मक सोच के साथ मनन करना . चिंतन का आरम्भ किसी समस्या या कठिनाई से होती है जिसका अंत समाधान के साथ होता हैं.
इस तरह से हम पाते हैं श्रवण, मनन और चिंतन तीनों एक दूसरे से जुड़े हैं. इन्हें अलग नही किया जा सकता . इनका आपस में सम्बन्ध हैं. तीनों एक तरह से क्रम में ही चलते हैं. जब तक किसी चीज़ का श्रवण नहीं किया जाएगा तब तक न ही उस चीज़ का मनन किया जा सकता हैं और नहीं उस पर चिंतन.

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ReplyDeleteNice view Puspanjali
ReplyDeleteप्रभावी लेख
ReplyDeleteधन्यवाद् मेरे मन की पार्टी को खोलने के लिए
ReplyDeleteअति सुन्दर और सत्य वचन🙏
ReplyDeleteसरल प्रतिपादन।
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